पूर्ण अवतार श्री कृष्ण की वो १६ दिव्य कलाएं जो उन्हें बनाती हैं जगतगुरु और परमात्मा।
चंद्रमा की १६ कलाओं (phases) की तरह, परमात्मा की भी १६ कलाएं होती हैं। जो अवतार इन सभी १६ गुणों से परिपूर्ण होता है, उसे 'पूर्ण अवतार' कहते हैं। श्री कृष्ण ही वो पूर्ण ब्रह्म हैं। आइए, एक-एक करके इन दिव्य कलाओं को जानें।
पहली कला है दया। श्री कृष्ण की करुणा सिर्फ मित्रों के लिए नहीं, शत्रुओं के लिए भी थी। जिस पूतना ने उन्हें मारने के लिए विष दिया, उसे भी उन्होंने माँ जैसी गति प्रदान की। व्यावहारिक सीख: दूसरों के प्रति दयालु बनें, भले ही वे आपके विरोधी हों।
दूसरी कला है धैर्य। चाहे इंद्र का प्रकोप हो या कालिया नाग का विष, कृष्ण कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने मुस्कुराते हुए गोवर्धन पर्वत उठा लिया। व्यावहारिक सीख: संकट के समय घबराएं नहीं, शांत मन से समाधान खोजें।
तीसरी कला है क्षमा। शिशुपाल ने भरी सभा में १०० अपशब्द कहे, लेकिन कृष्ण शांत रहे। जब सीमा पार हुई, तभी सुदर्शन उठा। क्षमा वीरों का आभूषण है। व्यावहारिक सीख: छोटी-मोटी गलतियों को माफ़ करना सीखें, इससे मन का बोझ हल्का होता है।
चौथी कला है न्याय। कुरुक्षेत्र में उन्होंने अपने सगे-संबंधियों के विरुद्ध जाकर धर्म और न्याय का साथ दिया। उनके लिए सत्य रिश्तों से बड़ा था। व्यावहारिक सीख: पक्षपात न करें, हमेशा सच और न्याय का साथ दें।
पाचवीं कला है निरपेक्षता। सुदामा के सूखे चावल हों या दुर्योधन का ५६ भोग, कृष्ण के लिए प्रेम महत्वपूर्ण था, हैसियत नहीं। वे अमीर-गरीब में भेद नहीं करते। व्यावहारिक सीख: लोगों को उनके पद या धन से नहीं, उनके व्यवहार से तौलें।
छठी कला है निरासक्त। वे गोकुल, वृंदावन, और द्वारका में राजा की तरह रहे, लेकिन जब छोड़ने का समय आया, तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। जल में कमल की तरह। व्यावहारिक सीख: संसार में रहें, कर्तव्य करें, लेकिन मोह-माया में बंधें नहीं।
सातवीं कला है तपस्या। श्री कृष्ण का पूरा जीवन ही कर्मयोग की तपस्या था। उन्होंने अर्जुन को गीता का ज्ञान देकर कर्म को ही पूजा बताया। व्यावहारिक सीख: अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण ही आपकी सबसे बड़ी तपस्या है।
आठवीं कला है अपराजित। कंस हो, जरासंध हो या महाभारत का युद्ध, श्री कृष्ण को कोई हरा नहीं सका। वे मन और रण, दोनों में अजेय हैं। व्यावहारिक सीख: अपनी इच्छाशक्ति को इतना मजबूत बनाएं कि कोई भी असफलता आपको तोड़ न सके।
नौवीं कला है दानशील। जब सुदामा आए, तो कृष्ण ने बिना मांगे ही उन्हें तीनों लोकों का सुख दे दिया। उनका दान गुप्त और असीमित होता है। व्यावहारिक सीख: देने में आनंद ढूँढें। निस्वार्थ दान ही सच्चा दान है।
दसवीं कला है सौंदर्यमय। मोर मुकुट, सांवली सूरत और पीतांबर। उनका सौंदर्य केवल शारीरिक नहीं, आत्मिक भी है जो पूरे ब्रह्मांड को मोहित करता है। व्यावहारिक सीख: अपनी आंतरिक सुंदरता और चरित्र को निखारें।
ग्यारहवीं कला है नृत्यज्ञ। कालिया नाग के फन पर मृत्यु के भय के बीच नृत्य करना केवल कृष्ण ही जानते हैं। यह जीवन के संघर्षों में संतुलन का प्रतीक है। व्यावहारिक सीख: मुश्किलें तो आएंगी, उनके बीच मुस्कुराना और जीना सीखें।
बारहवीं कला है संगीतज्ञ। उनकी बांसुरी की धुन से गायें ही नहीं, नदियाँ भी थम जाती थीं। संगीत प्रेम और शांति की भाषा है। व्यावहारिक सीख: अपने शब्दों और वाणी में संगीत जैसी मिठास लाएं।
तेरहवीं कला है नीतिवादी। महाभारत युद्ध में उन्होंने कूटनीति और धर्मनीति का प्रयोग कर अधर्म का नाश किया। समय के अनुसार उचित निर्णय लेना ही नीति है। व्यावहारिक सीख: सिद्धांतों पर अटल रहें, लेकिन परिस्थिति अनुसार बुद्धि का प्रयोग करें।
चौदहवीं कला है सत्यवादी। श्री कृष्ण परम सत्य (Absolute Truth) हैं। सत्य कभी बदलता नहीं, वह काल से परे है। व्यावहारिक सीख: सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन जीत हमेशा उसी की होती है।
पंद्रहवीं कला है सर्वज्ञ। वे भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता हैं। गीता में उन्होंने सृष्टि के हर रहस्य को उजागर किया है। व्यावहारिक सीख: ज्ञान की खोज कभी बंद न करें, सदैव सीखते रहें।
सोलहवीं कला है सर्व-नियंता। वे सृष्टि के कण-कण में हैं और उसे चलाते हैं। वे ही पालनहार हैं और वे ही संहारक। सब कुछ उन्हीं की इच्छा से है। व्यावहारिक सीख: उस परम शक्ति पर भरोसा रखें और अपना कर्म करते रहें।
श्री कृष्ण इसीलिए 'पूर्ण अवतार' कहलाते हैं क्योंकि उनमें ये १६ कलाएं पूर्ण रूप से जागृत थीं। इन गुणों को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारना ही सच्ची कृष्ण भक्ति है।
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