राणा सांगा: भूले-बिसरे योद्धा, या अटूट साहस की अमर कहानी?

क्या सच में एक हाथ, एक आँख खोकर भी लड़े?

संसद में चर्चा, फिर क्यों?

हाल ही में, समाजवादी पार्टी के नेता ने संसद में राणा सांगा का ज़िक्र किया. उनके बयान से राणा सांगा फिर चर्चा में आ गए. आखिर कौन थे राणा सांगा, और क्यों उनका नाम आज भी गूंजता है?

महाराणा संग्राम सिंह

राणा सांगा, मेवाड़ के महान योद्धा, जिन्हें 'संग्राम सिंह' के नाम से भी जाना जाता है. 1509 से 1528 तक मेवाड़ पर शासन किया, और अपने अटूट साहस के लिए प्रसिद्ध हुए.

दिल्ली सल्तनत को चुनौती

उस दौर में दिल्ली सल्तनत का दबदबा था. राणा सांगा उन चुनिंदा राजाओं में से थे, जिन्होंने दिल्ली सल्तनत को सीधी चुनौती दी. इब्राहिम लोदी के साथ खातोली और धौलपुर की लड़ाई, जिसमे राणा सांगा ने लोदी को हराया और अपना राज्य बचाया।

80 घाव, एक हाथ, एक आंख

कहा जाता है कि राणा सांगा के शरीर पर 80 से ज़्यादा घाव थे. उन्होंने एक हाथ और एक आंख खो दी थी, फिर भी युद्धभूमि में डटे रहे. यह उनकी वीरता की अविश्वसनीय मिसाल है.

राजपूत संघ: एक अनोखा प्रयोग

राणा सांगा ने एक अनोखा काम किया - उन्होंने विभिन्न राजपूत राज्यों को एकजुट किया. यह 'राजपूत संघ' उनकी दूरदर्शिता और कुशल रणनीति का प्रमाण था. उस समय, राजपूत राज्य आपस में लड़ते रहते थे, पर राणा सांगा की शख्सियत इतनी बड़ी थी, की सब एक साथ आ गए।

खानवा का युद्ध: निर्णायक मोड़

1527 में खानवा का युद्ध हुआ, बाबर के खिलाफ. यह युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. हालांकि, राणा सांगा बहादुरी से लड़े, लेकिन तोपखाने के प्रयोग के कारण हार गए.

विष देने का रहस्य

ऐसा माना जाता है कि राणा सांगा को उनके ही सरदारों ने ज़हर दे दिया था, क्योंकि वे फिर से बाबर से युद्ध करना चाहते थे. यह घटना आज भी एक रहस्य बनी हुई है. उनके अपने ही नहीं चाहते थे की वे दुबारा युद्ध करे।

विरासत: शौर्य गाथा

राणा सांगा की हार के बावजूद, उनकी विरासत आज भी जीवित है. उन्हें अटूट साहस, देशभक्ति और कुशल नेतृत्व के लिए याद किया जाता है. उनकी कहानी हमें प्रेरित करती है.

वीरता का प्रतीक

राणा सांगा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि शारीरिक कमज़ोरी कभी भी साहस और दृढ़ संकल्प के आगे नहीं टिक सकती. विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने की प्रेरणा.

लोकगीतों में राणा सांगा

राजस्थान के लोकगीतों और कहानियों में राणा सांगा आज भी जीवित हैं. उनकी वीरता और बलिदान की गाथाएं पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती हैं. आम जनमानस उनको एक नायक के रूप में देखता है।

इतिहास से सीख

राणा सांगा का इतिहास हमें सिखाता है कि एकता में ही शक्ति है. आपस में लड़ने के बजाय, एकजुट होकर बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है.

आज भी प्रासंगिक

राणा सांगा की कहानी आज भी प्रासंगिक है. यह हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए और अपने लक्ष्यों के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए. वे आज भी प्रेरणास्रोत है.

क्या हम भूल गए?

राणा सांगा जैसे योद्धाओं की कहानियों को याद रखना ज़रूरी है. क्या हम उन्हें भूल रहे हैं? उनकी वीरता और बलिदान को याद करके ही हम सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते है.